सोमवार, 27 अप्रैल 2009

लाशों का जंगल

हम..
तुम ...
वे...
सब के सब ....
लाशों के जंगल में राहें बनाते हुए;
खामोश;
बढ़ रहे हैं एक ओर
जिंदगी कि गहरी तलाश में....

हर एक लाश के पाँव
किसी बरगद की जड़ों की नाईं
हमारे पैरों को फाँसते हैं ..
बूढे पीपल
आपस में खुसफुसा कर
सन्नाटे में खाँसते हैं.

हर एक लाश के कान
तेजाबी बातों की दिशाएँ भाँपते हैं.
धारदार फीतों से
शब्दों को मापते हैं.

हर एक लाश की आँखें
ताजा साँसों पर चिपक जाती हैं.
अँधेरे में खुलती हैं ;
उजाले में दुबक जाती हैं.

हर लाश की नाक
बारूद की टोह लेती है .
जहाँ कहीं जलता है फास्फोरस.......
बूटों से रगड़ देती है .

ऐसे माहौल में...
हम ...
तुम ...
वे ....
सब के सब
जिंदगी को तलाश रहे हैं .

लाशों के जंगल में
आग लगा देनी है
आग की मीनारों पर
लहू से लिख देना है----

"इन्कलाब का कोई बेटा
आखिरी नहीं होता ...

"मौत की कीमत पर
हमें जिंदगी को लेना है ...."

2 टिप्‍पणियां:

  1. रक्त को उबाल देनी वाली कविताएँ हैं।
    आभार इन श्रेष्ठ रचनाओं से परिचित कराने के लिए ।
    ----------
    TSALIIM.
    -SBA-

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  2. namaskar mitr,

    aapki saari posts padhi , aapki kavitao me jo bhaav abhivyakt hote hai ..wo bahut gahre hote hai .. aapko dil se badhai ..

    is kavita ne to dil me ek ahsaas ko janam de diya hai ..

    dhanyawad.....

    meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

    http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

    aapka

    Vijay

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