सोमवार, 1 जून 2009

गांगेय (शर शय्या पर एकालाप)

प्रकृति सृजन का पूर्ण सत्य है ; कालचक्र शाश्वत है
वचन मनुज का अर्ध सत्य है ; शेष महाभारत है .

महाप्रकृति का कृति प्रवाह परिवर्तन-संचालित है.
अंहकार वश इसे रोकना विकृति है, निन्दित है

मानव अपने सहज धर्म से सृजन -सत्य जीता है
सर्वनाश को संयत करती कर्ममयी गीता है

मरण सृष्टि का एक सत्य है, एक सत्य जीवन है
मंगलमयी जन्म की गंगा, माँ का अनुवर्तन है

जहाँ सृष्टि का नियम , हठी मानव खंडित करता है
वहां एक गंगा का बेटा बुरी मौत मरता है

जन प्रवाह गतिशील सृजन-सरिता का योग-क्रम है
जी कुछ है विपरीत, वाही गर्हित नियोग है, भ्रम है

मानव इस भ्रम से अपना दुर्भाग्य स्वयं गढ़ता है
और ..एक आरोप कर्म के माथे पर मढ़ता है

ओ भी है निष्काम कर्म सामाजिक फल देता है
एक भागीरथ इस धरती को गंगाजल देता है

प्रकृति मिटा दे जिस धरा को वाही भाग्य रेखा है
कर दे जिसे प्रवाहित , वह अविकल्प चित्रलेखा है

जब भी कोई भीष्म वचन का यह उपयोग करेगा
कटते हुए वंश-वृक्षों का दृश्य देख सिहरेगा

और अधिक जीने की इच्छा उस क्षण मर जायेगी
जिस क्षण , गंगा शर-शय्या पर आत्म -वचन पायेगी

मर्माहत जिजीविषा मन को वंचित कर जाती है
मरने से पहले जीने की इच्छा मर जाती है

'मनुज वंश' है एक, रक्त में इसका मूल नहीं है
जहाँ कर्ण का सूर्य वंश है: इसका मूल वहीँ है

शासन सूर्य दृष्टि है, जन-जन के हित में वह सम है
अँधा है ध्रितराष्ट्र जहाँ पर दू:शासन का तम है

अम्बा का वैधव्य अगर कुल का संताप नहीं है
कुंती का कौमार्य: कर्ण, द्वापर का पाप नहीं है

ज्योतित कर्ण विचार-पुत्र है, कृति का संवाहक है
हर युग में इस धर्मवीर का हत्यारा शासक है

राजवंश के राजतंत्र का मूलमंत्र जड़ता है
वहां कर्ण हो या कि युधिष्ठिर, अंतर क्या पड़ता है

अभिशापित कुंती की कुंठा एक युद्ध का स्वर है
और दूसरा मुक्त विदुर का दृढ अयुद्ध का स्वर है

चित्र विचित्र वीर्य के धागे कितने उलझ गये हैं!
लेकिन प्रश्न प्रकृति नियमों के बरबस उलझ गये हैं

जहाँ कहीं कुंती की कुंठा आँचल फैलायेगी
वहां रक्त से द्वैपायन की धरती रंग जायेगी

जहाँ विदुर चुप रह जाएगा, नग्न द्रौपदी होगी
क्षय-संकर कुलमर्यादा की भग्न द्रौपदी होगी

गंगा, सत्यवती, पांचाली अथवा हो गांधारी
जब भी अपमानित होगी अविभाज्य विश्व की नारी

वहां महाभारत होगा , सिंहासन डोल उठेगा
वर्तमान चुप रहे , भविष्यत् निश्चित बोल उठेगा.

9 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत और कालजयी रचना है मेरा इसकी शान मे कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा शुभकामनायें

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  2. शाश्वत रचना है ............नमन है इस सुन्दर, अनुपम कृति को

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  3. गंगा, सत्यवती, पांचाली अथवा हो गांधारी
    जब भी अपमानित होगी अविभाज्य विश्व की नारी
    सत्य वचन
    श्याम सखा

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  4. बहुत उम्दा रचना! बधाई स्वीकारें।

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  5. बहुत ही बढ़िया है आपकी रचना!

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  6. बुद्धम शरणं गच्छामि................

    दो पल सुख से सोना चाहे पर नींद नही पल को आए
    जी मचले हैं बेचैनी से ,रूह ना जाने क्यों अकुलाए
    ज्वाला सी जलती हैं तन मे ,उम्मीद हो रही हंगामी .....
    बुद्धम शरणं गच्छामि................

    मन कहता हैं सब छोड़ दूँ मैं पर जाने कैसे छुटेगा ये
    लालच रोज़ बढ़ता जाता हैं लगती दरिया सी तपती रेत
    जब पूरी होती एक अभिलाषा खुद पैदा हो जाती आगामी......
    बुद्धम शरणं गच्छामि................

    नयनो मे शूल से चुभते हैं, सपने जो अब तक कुवारें हैं
    कण से छोटा हैं ये जीवन और थामे सागर कर हमारे हैं
    पागल सी घूमती रहती हैं इस चाहत मे जिन्दगी बे-नामी........
    बुद्धम शरणं गच्छामि................

    ईश्वर हर लो मन से सारी मोह- माया जैसी बीमारी
    लालच को दे दो एक कफ़न ,ईर्ष्या को बेवा की साड़ी
    मैं चाहूँ बस मानव बनना ,मांगू एक कंठी हरि नामी ....
    बुद्धम शरणं गच्छामि................

    (सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा )

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