गुरुवार, 4 जून 2009

आईना

शहर का चेहरा
काला पड़ गया है.
इधर कोई आईनाफरोश नहीं आया.

गाँव का चेहरा
पीला हो गया है.
यहाँ
आईने को
कोई नहीं जानता.

चकलों में
आईने ही आईने हैं.....
क्योंकि
यहाँ चेहरे नहीं हैं.

आदमी,
चेहरे
और
आईने के वजूद;
बिल्कुल
अलग होते हैं...

यह बात
देर से समझ में आती है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदमी, चेहरे और आईने के वजूद के बहाने जिंदगी के फलसफे को बयां करती है आपकी कविता।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  2. शहर का चेहरा
    काला पड़ गया है.
    इधर कोई आईनाफरोश नहीं आया.

    गाँव का चेहरा
    पीला हो गया है.
    यहाँ
    आईने को
    कोई नहीं जानता.



    यथार्थ दिखलाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
    वीनस केसरी

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